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करिया बादर उमड़ घुमड़ के छागे.
खेत -खार के मुड़ उप्पर मा छागे,
गर्रा संग उढिया के कूप अंधियार होगे,
हरियर खेत के मुंहुं देखेबर झपागे,
मेड़ तरी आंखी मुंद के लुकागे.
करिया बादर उमंड़ -घुमंड़ के छागे....
चुमत हे माथा मेड़ तीर मा लुकाके,
लजागे बाली धान के ठंडागे सिहरगे,
बूंद के पियासे, जरत भुंइया बाली धान के,
छाती मा ठंडक पाके, हांसत हे मुच-मुच ले.
करिया बादर उमंड -घुमंड के छागे.....
सुवागत हे तुंहार आगे हव बड़ मनौती ल मान के,
तय बरस करिया बादर रद-रद ले जम के,
खेत -खार तरिया नरवा झुमरत हे खुसी ले,
तोला देखहुं असाढ़ -सावन -भादो ल जान के.
करिया बादर उमंड़-धुमंड़ के छागे.....
बरसे पानी म फूंदक -फूंदक के चिरई मन डुबकी लगावत हे,
मेचका टर्र -टर्र नरियावत, ऐती -तेती कूदत हे,
लइका मन डोगा बना के, पानी म ढ़िलत हे,
बादर पानी ल देख के सफ्फा जग आनंद मनावत हे.
करिया बादर उमंड़-घुमंड़ के छागे.....
कवयित्री
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डॉ. जयभारती चंद्राकर
प्राचार्य
जी/4/12/जी ए डी, सिविल लाईन
गरियाबंद (छ. ग.), पिन नं. -493889
मोबाइल नं. 9424234098
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