Monday, June 3, 2019

एे मेरे रब क्यूं मुझको मेरा घर अच्छा नहीं लगता(ग़ज़ल) by जितेंद्र सुकुमार  'साहिर '

ग़ज़ल

एे मेरे रब क्यूं मुझको मेरा घर अच्छा नहीं लगता
यहां सब कुछ है जाने क्यों मगर अच्छा नहीं लगता

मुझे क्यों काटने लगती है हरदम मेरी तन्हाई
तेरे बिन अब कोई भी हो सफ़र अच्छा नहीं लगता

ये माना वो बगीचे की फ़क़त शोभा ही देता है
ये भी सच है बिना फल के शजर अच्छा नहीं लगता

मैं अक्सर तेरी यादों के ही शब में खोया रहता हूं
कि जाने क्यों मुझे अब यह सहर अच्छा नहीं लगता

मेरे दिल को जिधर आहट न उनकी अब मिले साहिर
कि हरगिज़  अब मुझे जाना उधर अच्छा नहीं लगता

✍जितेंद्र सुकुमार  'साहिर '
       शायर
'उदय आशियाना 'चौबेबांध (राजिम) पोस्ट बरोंडा जिला गरियाबंद (छत्तीसगढ़ )493885
व्हाट्सएप नंबर 90091 87981
9827345298

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