Monday, June 3, 2019

आंगी अस तपत हे भुइंया (छत्तीसगढ़ी कविता) by- डॉ.जयभारती चन्द्राकर


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जेठ के महिना आंगी अस तपत हे भुइंया.
बिहिनिया ले चक-चक ले घाम हर उवे हे,
चिरिया चुर-गुन नइ दिखे अब मोर अंगना.
अब्बड़ तपत हे घाम हर ,भोेंभरा जरत हे पांव,
इही रूख-राई नइ रहितिस त कहां बांचतिस हमर परान.
चिरई-चुरगुन के घरौदा हे ,इही रूख -राई के छांव.

जेठ के महिना........

घाम घरी तरिया-नंदिया जम्मो हवय अटागे,
तपत घाम ले कुरिया ले निकलतिस झन अइसना लागथे,
कब जाही घाम अब्बड़ हलाकान होगे जीव ,
जम्मो सकलागे मनखे ,जंगली जानवर जुड़ रूख छईया म.
जेठ के महिना...

           कवयितरी
      डॉ.जयभारती चन्द्राकर
    सिविल लाईन गरियाबंद ,जिला गरियाबंद
      छ.ग.
    मोबाईल 9424234098

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