विधा- दोहा
मन मोहन मन में बसा, मन वृन्दावन धाम ।
होंठो पे हरपल रहे, राधा मोहन नाम ।।
श्याम नाम निशदिन जपूँ, मूरत नैन समाय ।
हुई बावरी श्याम की , कुछ भी नहीं सुहाय ।।
मन कहता यह तन बनें ,वृन्दावन की धूल ।
श्याम चरण से लिपटकर , जाय खुशी से फूल ।।
कहे मगन मन बावरा, नाचूँ ब्रज बन मोर ।
पंख सजे उनके मुकुट , जो है नंद किशोर ।।
मन मेरा यह भी कहे, बनूँ कदम की डाल।
झूला झूले राधिका, संग गोप गोपाल ।।
केवरा यदु "मीरा "
राजिम (छ ॰ग)
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