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हर कोई देता है यहाँ,
नित बैठे उपदेश।।
कोई दिखता क्यों नही,
जो सँवारे मेरा वेश।।
जो सँवारे मेरा वेश और,
धरती पर लाए खुशहाली।
ऐसा कोई काम करे,
फिर से छाये हरियाली।।
फिर से छाये हरियाली,
बरसे फिर छम छम पानी।
पानी से ही समृद्ध होत,
मानव तेरी जिंदगानी।।
मानव तेरी जिंदगानी,
प्रकृति पर ही टिका है।
बिन प्रकृति के मानो,
अस्तित्व तुम्हारा फीका है।।
अस्तित्व तुम्हारा फीका है,
बिन संस्कृति, बिन प्रकृति ।
प्रकृति बचाए पानी,
संस्कृति बचाए वाणी।।
पानी जहां की है बिगड़ी,
प्रकृति बिगड़ सी जाती है।
वाणी जहां की है बिगड़ी,
संस्कृति ही बिगड़ जाती है।।
वाणी और पानी की,
करो तुम सच्चा मोल।
मिलते ये बेमोल है।
पर होते हैं अनमोल।।
रचनाकार💐
श्रवण कुमार साहू"प्रखर"
राजिम, गरियाबंद
मो न 9009540810
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