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एक लकड़हारा लकड़ी काटने,
नदी किनारे खड़ा था।
उनके कुल्हाड़ी की वार ,
हर बार लकड़ी पर भारी पड़ा था।
देखते ही देखते ही उसने,
सारे पेड़ काट डाले।
माथे पे पड़ी पसीना,
हाथों पर पड़ गए छाले।।
भूख और प्यास से,
वो बैचेन हो रहा था।।
गर्मी के मारे,अपनी,
आपा खो रहा था।।
इस बैचेनी का ,
क्या हल मैं निकालूँ।
अगर दिखे कहीं पेड़,
तो जाकर मैं सुस्ता लूँ।।
पर दिखा ना कोई पेड़,
ना दिखा कोई ठिकाना।।
पेड़ काटकर काहे तू,
खोजे फिर आशियाना।।
पेड़ काटकर खुद वो,
हुआ फिर शर्मिंदा।।
प्रकृति के बिना भला,कोई
यहाँ रह सकता है क्या जिंदा ?
रचनाकार
श्रवण कुमार साहू"प्रखर"
राजिम,गरियाबंद(छ .ग.)
Sunday, June 9, 2019
पश्चाताप by श्रवण कुमार साहू"प्रखर"
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