गर मैं होता चाँद तुम्हारा, और तुम मेरी चाँदनी होती।
बिन किए मुलाकात मुझसे, तुम रात भर ना सोती।।
दिन में ना मिलता चैन तुम्हें, इंतेज़ार रात का करती।
दिनभर फिरती बावरी सी, मिलने को रात में संवरती।।
चाँद, चाँदनी के बहाने सही, मिलना रोज तुमसे होता।
ना मिलने का गम लेकर, दिल मेरा तो ना सोता।।
रोज मिलकर हम करीब से, तुम्हें देख तो आखिर पाते।
सूरत में तेरी मुस्कान बिखेर, दूसरों को भी खुशी दे पाते।।
रोज बिछड़ कर भी तुम, अपनी दीप्ति बनाये रखती।
प्यार में मर मिटने का एक, मिशाल जलाये रखती।।
पुष्पराज साहू "राज"
छुरा (गरियाबंद)
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