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हे! शनिदेव हे! शनिदेव
मैं वंदन करूं तेरा सदेव
बार-बार करता हूं नमन
करता हूं बस तेरा भजन
ना लगे कभी मुझे ठोकर
विनती करता हूं रो-रोकर
छाया है जो तुम्हारी माता
और सूर्य तो है तेरा पिता
तेरी लगी अढ़ाई साढ़े साती
बुझने लगती है दिया-बाती
अरे श्याम वर्ण है जो तेरा
तू तो नवग्रहों पे डाले डेरा
पृथ्वी के हो दण्डाधिकारी
बुलाते नहीं है तुझे नर-नारी
मेरे घर में करना तुम प्रवेश
फिर घर में न आवे क्लेश
✍गुणेन्द्र सिंह पोर्ते "अविराम"
फिन्गेश्वर राजिम छत्तीसगढ़
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