जिला: रायपुर ।
राज्य: छत्तीसगढ़ ।
विषय: मनमीत ।
शीर्षक: मनमीत ।
विधा: छंद-मुक्त कविता ।
मोबाइल: 6264189643 ।
दिनांक: 30/8/2024 ।
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मनमीत
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तुम्ही मेरे मनमीत हो - - -
तुम्ही मेरे प्रियवर हो ,
तुम्हें पाने जग को हारा ,
पीया मैंने भक्तिरस विष प्याला ।
कहूँ मैं सबसे,तुम मेरे रखवाले- - -
तुम्ही हो मेरे मनमीत प्यारे ,
लागी प्रीत मन ही मन तुझसे ,
मैं तो अपना सुध-बुध खोई ।
अपनों का संग है छोड़ा - - -
और भटक रही हूँ दर-दर ,
कहाँ छुपे हुए हो, मेरे मनमीत,
तुम्हारे दर्श को कब से तरस रही ।
तेरी छवि कैसी होगी--
मनमीत बन ढूंढ रही ,
मुझको भी, मालूम नहीं,
ना ही कोई बता रहा ।
फिर भी डूबी हूँ, तेरे प्रेमरस- - -
क्या जादू किया है मुझ पर तुमने ,
मैं तो बावरी हो गई, तेरी याद में ,
इतने निर्दयी मत बनो मेरे मीत ।
तुम तो जगत के दायनीधि हो -- -
तुम्ही सबकी मुरादें पूरी करते हो ,
मुझ पगली को कैसे भूले हो ,
तुम्ही तो मेरे दिल अज़ीज़ हो ।
मुझे तुम किस रूप में---
कहाँ मिलोगे, अब तो बता दो ,
अब अपनी ज़िद छोड़ दो ,
तुम ही तो, मेरे मनमीत हो ।
मुझसे क्या नाराज़गी है--
दिलदार बन, अब तो बता दो ,
तुम्ही बताओ, तुम कैसे मानोगे ,
अब तो बता दो, बहुत हो चुका है ।
मैं अब सब कुछ छोड़कर ---
शरणार्थी बन ,तेरे शरण में आई ,
थोड़ी सी जगह, अपने दिल में दे दो,
मुझ दुखियारी तुम ही एक सहारा ।
मैं तुम्हें क्या नाम दूँ--
किस नाम से पुकारा करूँ,
मेरी इतनी सी, फरियाद तो सुनो ,
मेरी तपस्या, मेरी मुराद होगी पूरी ।
तुम्ही तो मेरे मनमीत हो--
तुम्ही मेरे दिलवर हो,
चाहने वालों को, कभी मायूस ना करें,
तुम ही तो हो, इस जग के रखवाले ।
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मौलिक रचना, बोरियकला, रायपुर ।
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