राज्य: छत्तीसगढ़ ।
जिला: रायपुर ।
विषय: विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस ।
शीर्षक: बँटवारे का दर्द ।
विधा: छंद-मुक्त कविता ।
मोबाइल: 6264189643 ।
दिनांक: 14/ 08 /2024
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-।। बँटवारे का दर्द ।।-
आजादी दिलाने कितने हुए कुरबाँ---
अंग्रेज़ हुकुमत की हुई थी बिदाई ,
खुशनुमा-सा लगा था वो दिन ,
15 अगस्त, 1947 की थी वो तारीख़।
बिना भेदभाव, देश की आजादी में--
हरेक वर्गों, कस्बों से लेकर शहरों तक,
किशोर, युवा, महिला-पुरुष व बुजुर्ग,
सबके त्याग, बलिदानी की है वेदी ।
उस दर्द भरे पलों की विभीषिका--
जब देश का आपसी बँटवारा हुआ,
अपनों का अपने से गमगीन जुदाई,
था बहुत,धरा से बिछुड़ने का गम ।
अजीब सा दिखता था वो मंज़र--
हिन्दुओं-मुसलमानों,भारत-पाकिस्तान
इस शब्द की व्यथा की मार्मिक धारा,
कलुष सी रातें, हैवानियत मातम डेरा।
जबर्दस्ती बेदख़ली होने का सदमा--
जीते-जी मुर्दा-सा हुआ था शरीर,
जमीं का बँटवारा, भावनाएं थीं मरी,
कैसे कहें,कैसे लिखें, दर्दनाक कहानी।
परिवार,रिश्तों, माटी की गंध से--
अनायास छूटती,लुटती, बिखेरते हश्र,
मरघट-सा बना,चेहरे के हाव-भाव ,
मजहबी बँटवारा,बनीं खून की होली ।
मैं दुखित मन से यही कहूँगा---
बँटवारा- जमीं का हो या रिश्तेदारों से,
जब भी,,जिसका भी हो,कोई कारण,
जीते-जी व्यक्ति मुर्दा बन ही जाता है ।
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स्वरचित मौलिक प्रस्तुति ***
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