ब्लॉक--आरंग
जिला --रायपुर
राज्य --छत्तीसगढ़
विषय---कविता
शिर्षक---हमारी संस्कृति
विधा--छंदमुक्त
मो.-९७५३१६४८८५
दिनांक 27 मई
*कविता*
"संस्कृति हमारी"
ब्रम्हा ने सृष्टि निर्माण की,
मानव ने बनाई संस्कृति
संसार की संस्कृति से,
निराली मेरे वतन की संस्कृति ।।१।।
समा दी मानुष संस्कृति को,
आदि से अनन्त हुई मानवीय विकास
ऐसा है मेरा ये चमन,
मेरी ये संस्कृति की पहचान ।।२।।
पशु-पक्षी , जीव-जन्तु सब को जोड़ा,
दिन-रात के अनुरुप हमकों संजोया
ये संस्कृति अजीब निराली,
दुनिया को हमनेँ सीखाया
संस्कृति के मिशाल बनें हम,
जगत ने इसे अपनाया ।।३।।
कश्मीर से कन्या कुमारी तक,
देखे हमने अनेक संस्कृति
अनेकता में एकता का प्रतीक,
विश्व में बयाँ अपनी संस्कृति
यही है मेरी सु-संस्कृति ।।४।।
सभी का रखा हमने ख्याल,
क्या?हिन्दू क्या?मुसलमान
संस्कृति तो हमने सब के लिए बनाई,
ये मेरे हिन्दू-मुस्लिम,सिक्ख-ईसाई
हम सब भाई-भाई ।।५।।
कुछ ने अच्छे से अपनाया,
वर्तमान ने कुछ ठुकराया
पर,भी हमने न संतुलन बिगाड़ा,
वर्तमान को भी यही सीखाया ।।६।।
संस्कृति सभी के अनुरूप हमारी,
तभी तो सभी ने इसे अपनाई
ऐसी संस्कृति और न कहीं,
यही संस्कृति दुनिया को हमने सीखाई ।।७।।
दूसरी संस्कृति में क्या-न-क्या?
हमारी संस्कृति में और क्या-न-क्या?
लय,ताल,सुर,और न जाने क्या-न क्या,
नृत्य,नाच,गान,वाद्ययन्त्र की तान
ऐसी मेरी संस्कृति में जान ।।८।।
बाग-बगिचे के कलियों में,
खिलती मेरे वतन पें
बयाँ होती मेरी संस्कृति,
वस्त्र में,खेत में,वन में,
हम सब के मन में
मेरे वतन की सभ्य संस्कृति ।।९।।
दुनिया के मान चित्र में,
संस्कृति तो सब की बनी
लेकिन,ऐसी संस्कृति है कहाँ?
भारत-भारतीय के तन-मन में सभी ने कहा
दिया मेरा वतन समृद्धि की मिशाल,
सुन लेना बता रहा कवि हरमन कुमार ।।१०।।
रचनाकार/कलमकार
हरमन कुमार बघेल
आरंग(महानदी)
जिला-रायपुर
छत्तीसगढ़
No comments:
Post a Comment