जिला _दुर्ग
राज्य _छत्तीसगढ़
विधा_ काव्य
शीर्षक_”सीता सम कोई कहीं नहीं"
सम्पर्क नंबर_ ७९७४६३१५२८
बनकर राघव की अर्धांगिनी
जब अयोध्या की कुल वधू बनी
रीत निभाने रघुकुल की
संग पति के कानन ओर चली
महलों में रहने वाली
कांटों को पुष्प समझ चली
हरण कर लिया दशानन ने जब
अशोक वाटिका में वह रही
वनवास काट जब अयोध्या आई
महारानी सीता कहलाई
वरन विधाता के खेल देखो
महलों से पुनः वन को गई
जनक नंदिनी सदा पलकों में रही
आज पलकों में है अश्रु भरी
अग्नि परीक्षा कब तक दे जग को
सीता सम कोई कहीं नहीं
*प्रिया गुप्ता*
*भिलाई*
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