*जिला - सक्ती*
*राज्य - छत्तीसगढ़*
*विषय - यादें*
*शीर्षक - "गाँव"*
*विधा - "मुक्तामणि छंद"*
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कितना प्यारा गाँव है , अद्भुत अजब निराला ।
वाणी अनुपम मधु सखे , पी लेना भर प्याला ।।
सुख-सौभाग्य यहाँ पले , हँसती जीवन धारा ।
किलकारी गूँजे सदा , ऐसा गाँव हमारा ।।
मिल सुशील सम मीत से , हर्षित हो जाता हूँ ।
मित्र और भी हैं भले , सब समीप पाता हूँ ।।
नावा तरिया पार में , बरगद एक खड़ा है ।
बचपन को हाँ याद कर , गदगद हृदय पड़ा है ।।
हरपल पनखत्ती हमें , रह - रह पास बुलाता ।
पीपल पत्ते देखिए , कैसे पवन डुलाता ।।
मंदिर मध्य विराजते , हरहर शंकर भोले ।
छाँव गाँव के प्रेम में , मन 'नरेन्द्र' का डोले ।।
बैठे माझाखोल में , बात किया करते थे ।
रूठें मत हमसे कभी , सोच मित्र डरते थे ।।
चित्र परस्पर प्रेम के , आओ फिर से खींचें ।
हर्षित भाव उमंग भर , हिय बगिया को सींचें ।।
*(नरेन्द्र वैष्णव "सक्ती")*
*छत्तीसगढ़*
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