Sunday, May 19, 2024

सक्ति से नरेंद्र वैष्णव की रचना- गाँव

*कवि - नरेन्द्र वैष्णव "सक्ती"*
*जिला - सक्ती*
*राज्य - छत्तीसगढ़*
*विषय  - यादें*
*शीर्षक - "गाँव"*
*विधा - "मुक्तामणि छंद"*
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कितना प्यारा गाँव है , अद्भुत अजब निराला ।
वाणी अनुपम मधु सखे , पी लेना भर प्याला ।।
सुख-सौभाग्य यहाँ पले , हँसती जीवन धारा ।
किलकारी गूँजे सदा , ऐसा गाँव हमारा ।।

मिल सुशील सम मीत से , हर्षित हो जाता हूँ ।
मित्र और भी हैं भले , सब समीप पाता हूँ ।।
नावा तरिया पार में  , बरगद एक खड़ा है ।
बचपन को हाँ याद कर , गदगद हृदय  पड़ा है ।।

हरपल पनखत्ती हमें , रह - रह पास बुलाता ।
पीपल पत्ते देखिए , कैसे पवन डुलाता ।।
मंदिर मध्य विराजते , हरहर शंकर भोले ।
छाँव गाँव के प्रेम में , मन 'नरेन्द्र' का डोले ।।

बैठे माझाखोल में , बात किया करते थे ।
रूठें मत हमसे कभी , सोच मित्र डरते  थे ।।
चित्र परस्पर प्रेम के , आओ फिर से खींचें ।
हर्षित भाव उमंग भर , हिय बगिया को सींचें  ।।
             *(नरेन्द्र वैष्णव "सक्ती")*
                      *छत्तीसगढ़*

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