रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , कंवर ,
जिला - बालोद
विषय - इंसानियत
संपर्क - 9981510259
बस धरा पे इंसानियत हो
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जहां देखो चारों ओर ,
धर्म का व्यापार है ,
पाखंड क्यों बढ़ रहा ?
घटता देखों प्यार है ,
मजहबी खुरेन्जें बढ़ रहें हैं खोटकर ,
धरातली हैं लड़ाइयाँ इंसानियत पे चोटकर ,
हक सभी को आगे बढ़ने का ,
पर क्यूं दूजे को गिरना ?
जीत सभी का हो सके तब ,
फिर किसी को क्यूं हराना ?
मानवता तो कहता है ,
दया , प्रेम बाँट तू ,
बड़े होने का दंभ से
अपनेपन को न पाट तू ,
राम - रहीम एक हो तो विवाद कौन लाएगा ?
इंसानियत पर खरे रहो तो फसाद कौन लाएगा ?
हर कोई दिखावें के धार्मिक हैं ,
इंसानियत को छोड़कर ,
पंथ , मजहब कई बनें हैं ,
भाईचारे तोड़कर ,
काश ऐसा हो कभी कि
पाक-साफ नियत हो ,
मेरा - तेरा कोई न हो ,
बस धरा पे इंसानियत हो ,
- - शैलेन्द्र चेलक - -
पेंड रवानी , कंवर , बालोद , छ.ग.
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