Wednesday, December 21, 2022

बालोद से शैलेन्द्र चेलक की रचना- छत्तीसगढ़ के संत गुरुघासी दास

रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी, बालोद , छत्तीसगढ़
विषय- छत्तीसगढ़ के संत गुरुघासीदास
 शीर्षक - छत्तीसगढ़ के संत गुरुघासी दास
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          ॐ सत्यपुरूषगुरुघासीदासम त्वम नामानि।
तव चरणौ अनुरम्यम गुरुपद कंज प्रणम्यहम ।
सत्यं धर्मह सत्यं व्रतः सत्य ही यस्य जीवनं।
सत्य ही धर्म उपदेशकौ श्रीगुरुघासीदासम नमाम्यहम।। 
              
         छत्तीसगढ़ अंचल कई संत महात्माओं की जन्म व कर्मभूमि रही है। कई महात्माओं ने अपने महा मानवीय गुणों से ना केवल अपने अंचल में बल्कि राष्ट्र व वैश्विक स्तर पर अपने उपदेशों व संदेशों के माध्यम से अमर हो गए। उनका सामाजिक व आध्यात्मिक योगदान समरसता,मानव मानव एक समान ,वर्ग भेद, जातिभेद और भी कई विषमता को दूर करने आजीवन संघर्ष करते रहने में रहा।ऐसे ही उपदेशों व संदेशों को जनमानस में बिखेरने वाले परम संत महा तपस्वी बाबा गुरु घासीदास छत्तीसगढ़ अंचल के बलौदाबाजार जिला के ग्राम गिरौदपुरी में 18 दिसंबर सन 1756 ई. में महंगू दास और अमरौतीन माता के घर जन्म लिए । बचपन से कुशाग्र बुद्धि व अपने दैविक गुणों के कारण वे समाज में चर्चा का विषय बने रहे। उनके द्वारा बाल्यकाल में ही किए गए अप्रत्याशित व चमत्कार पूर्ण कार्य उनके महात्मा व संत होने की नियति को चरितार्थ कर 'होनहार बिरवान के होत चिकने पात ' कहावत को सत्य साबित करता है।समस्त महात्मा अपने चरित्र के माध्यम से ही अन्यों  के लिए उदाहरण बने हैं ।वैसे ही बालक घसिया अपने साथी बुधारू को जीवनदान, गाय व अपनी पत्नी को जीवनदान, मिर्च की बाड़ी से भटा लाना ,5 काठा धान को 5 एकड़ में बुवाई करना  जैसे चमत्कारिक कार्य किए। इनके पीछे उनका सत्य के खोज के प्रति कठिन तपस्या, त्याग व समाज के प्रति उनका आत्मसमर्पण है । वे औरा -धौरा पेड़ के निचे घोर तप किए। सतनाम को प्राप्त किये फिर सतनाम का ही प्रचार अलग अलग जगह में घूम घूमकर रावटी स्थालों में उपदेश व संदेश देकर लोगों के बीच व्याप्त अंधविश्वास व भ्रांतियों को दूर किए। उनका उपदेश ही था कि उस समय अधिकतर जातियां सतनाम धर्म को स्वीकार कर सतनामी बन गए। अपने जीवन के सार रहस्यों को वे अपने संदेश व उपदेशो में स्थान देकर लोगो को जागरूक कर कर्मकांड से मुक्ति दिलाये छुआ छूत मिटाने का नीव रखें। वे निम्न है :-
१ सतनाम को मानो ।
२ मानव मानव में भेद मत करो।
३ नशा सेवन , मांस भक्षण मत करो।
४ कर्म साफ रखो , चोरी जुआ व्यभिचार आदि पाप मत करो।
५ पर धन पत्थर जानो , पर तिरिया को माता मानो।
६ रहन सहन में सादा रहो, स्वाभिमान , स्वतंत्रता एवं ब्रह्मचर्य की रक्षा करो।
७ जीव हिंसा मत करो।
८ जाति मनुष्य द्वारा बनाया शोषण का एक माध्यम ही है जिसके द्वारा एक मनुष्य दूसरे पर राज करना चाहते हैं। यदि ईश्वर जाति बनाते तो पशु- पक्षियों की भी जाति होती । 
आशय ये है कि वे भी तेली ,कुर्मी ,सतनामी जैसे जाति होते या हिन्दू -मुसलमान होते पर ऐसा नही होता। 
       वर्तमान परिवेश में बाबा जी के उपदेशों व संदेशों की प्रासंगिकता और अत्यधिक नजर आ रही है। जब धार्मिक कट्टरता का वहन करतें लोग हिंसक प्रवृतियों को बढ़ावा दे रहे हैं।हमें इन सब कट्टरता में न पड़कर मानवता को बढ़ाने प्रयास करने चाहिए।

         - - शैलेन्द्र चेलक - -

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