Monday, November 7, 2022

रायगढ़ से उर्मिला सिदार की कृत आलेख- उत्सव

लेखिका -उर्मिला सिदार 
जिला- रायगढ़
राज्य -छत्तीसगढ़ 
विधा -पद्य 
शीर्षक- उत्सव
संपर्क नंबर- 930 32 98 994
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उत्सव अर्थात खुशी।हर मनुष्य उत्सव पूर्वकअर्थात खुशी के साथ जीना चाहता है ।वह मन, तन और वातावरण तीनों जगह उत्साहित होकर जीना चाहता है।मन ,तन और  संबंध अर्थात जहां वह जीता है ,वहाँ वह खुशी-खुशी न्याय पूर्क जी पाए यही मानव जाति के लिए उत्सव पूर्वक जीना है। कोई भी संबंध में किसी भी प्रकार का विरोध ना हो और शरीर को जिंदा रखने के लिए पर्याप्त भौतिक संसाधन हो और संबंधों को पहचानते हुए मूल्यों का निर्वहन हो ऐसी स्थिति ही ,समस्या से मुक्त स्थिति है । समस्या से मुक्त जीवन को ही उत्सव पूर्वक जीना कहा जाता है, यही उत्सव है ।समस्या से मुक्त जिंदगी, सभी के साथ प्रेम पूर्वक व्यवहार और आचरण के साथ जीना ही सुखद जिंदगी है ।इसी का नाम उत्सव पूर्वक जीना है ।हमारे परंपरा में श्रेष्ठ लोग कहते हैं ,कि जीवन नित्य उत्सव है ।जो मनुष्य  सभी संबंधों के साथ किस तरह जीया जाए इसकी समझ होती है।तो वह हर संबंधों के साथ न्याय पूर्वक जीता हुआ उत्सवित होता है। श्रम के साथ समृद्धि पूर्वक जीता है तो शांति पूर्वक जीना होता है यही उत्सव है। सुख शांति के साथ जीना ही उत्सव है। परंपरा में त्योहार के रूप में उत्सव मनाते हैं जो भौतिक वस्तु तक सीमित रह जाता है। और क्षणिक संतुष्टि मिलती है संतुष्टि की निरंतरता भौतिक वस्तु में नहीं होती यही पीड़ा है। कुछ पल बाद पूर्ववत स्थिति पुनः आ जाता है। निरंतर सुख पूर्वक जीना नहीं बनता और जब निरंतर सुख पूर्वक जीना नहीं बनता है, तो इसे नित्य उत्सव नहीं कहा जा सकता। हर एक उत्सव से तृप्त नहीं मिलती अतः उत्सव पूर्वक जीने के लिए समाधान समृद्धि पूर्वक समझदारी के साथ जीना ही उत्सव है। गुरु मूल्य में लघु मूल्य समाया रहता है जो समझदारी के साथ जीता है उसमें भौतिक वस्तु की खुशियां समाई रहती है अतः श्रेष्ठ वस्तु समझदारी है जो समझदारी के साथ सभी के साथ जीता है और मन में किसी भी प्रकार की समस्या और अभाव नहीं होता उसी स्थिति का नाम उत्सव है। अतः महापुरुषों ने ठीक ही कहा है अगर जीना आता है तो जिंदगी नित्य उत्सव है। नहीं तो झेलना है।
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उर्मिला सिदार बुलाँकी रायगढ़ छत्तीसगढ़

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