लेखिका-गोमती सिंह
जिला-कोरबा
राज्य-छत्तीसगढ़
विषय-ब्रम्हचर्य
विधा-गद्य
शीर्षक-ब्रम्हचर्य
संपर्क नंबर- 8103564763
-- शिशु के जन्म से 5 वर्ष हो जाने के बाद ब्रम्हचर्य की शिक्षा दी जाती है।
ब्रम्हचर्य अर्थात ब्रम्ह ( ईश्वर) को जानना । ब्रम्ह को जानने के लिए यम , नियम , प्राणायाम, ध्यान आदि के द्वारा ब्रम्ह को जाना जाता है।
ब्रम्हचर्य का दूसरा अर्थ होता है इन्द्रियों पर संयम ।
इन्द्रियों पर संयम करते हुए हम यम , नियम , प्राणायाम ध्यान आदि करके तथा वेदों ग्रंथों का अध्ययन करके हम ब्रम्ह को जानने के मार्ग में अग्रसर हो सकते हैं।
इसके लिए गुरू तथा सत्संग का होना अनिवार्य होता है ।
5 वर्ष से लेकर 21 वर्ष तक का जीवन ब्रम्हचर्य जीवन होता है ।
इस अवस्था में ध्यान तथा इन्द्रियों पर संयम करते हुए मनुष्य ब्रम्ह को जान जाते हैं। फलस्वरूप ये होता है कि ब्रम्ह को जानने वाले मनुष्य से अपराध नहीं होता। तत्पश्चात वह गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता है । जहाँ वह अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों को पूर्ण करता है ।
अतः ब्रम्हचर्य जीवन की शिक्षा अत्यंत आवश्यक होता है ।
।।इति।।
-गोमती सिंह
कोरबा,छत्तीसगढ़
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