Thursday, June 10, 2021

उत्तराखण्ड से सुलोचना परमार "उत्तरांचली" की रचना- औपचारिक हो गए

नाम- सुलोचना परमार"उत्तरांचली"
शीर्षक- बहुत औपचारिक हो गए हैं
राज्य- उत्तराखण्ड


       

कभी आते थे वो घर में
मुहल्ले में साथ चलो मेरे।
प्रचार करना है जिताना है
तब पैर थक जाते थे मेरे ।


जीत कर मिली जो कुर्सी तोवो
*, बहुत औपचारिक हो गये हैं।*


अब न मुंह लगाते किसी को
बहुत ही व्यवहारिक हो गये हैं।
हर समय हैं ऐंठ में रहते वो
अब जैसे खुदा वो हो गये हैं।


अब उनके साथ हम भी
*बहुत औपचारिक हो गये हैं।*


जिस घर से कोई अब
कमाये विदेश में पैसा।
अकड़े रहते वो हरदम
 मुंह  बनाते फुटबॉल जैसा ।


हाय, हेलो ही करते गर्व से
*बहुत औपचारिक हो गये हैं*।


ज़माना इस कदर आगे बढ़ा
फुर्सत नहीं है मिलने की ।
अपने बच्चों संग भी अब
फुर्सत कहां बात करने की।


मां बाप से मिलने में भी अब
*बहुत औपचारिक हो गये हैं*।

रिश्ते नातो में भी अब
दिल के तार कहां जुड़ते हैं।
जो निकल गये हैं आगे
वो पीछे कहां मुड़ते हैं ।


दोस्त ही अब दोस्त से
* बहुत औपचारिक हो गये हैं *


कभी प्यार की कसमें खाते थे
और जीते थे प्यार को।
अब वो दिल ही न रहे
तो कैसे निभायें प्यार को ।


प्यार करने वाले भी अब
*बहुत औपचारिक हो गये हैं*।



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