शीर्षक- बहुत औपचारिक हो गए हैं
राज्य- उत्तराखण्ड
कभी आते थे वो घर में
मुहल्ले में साथ चलो मेरे।
प्रचार करना है जिताना है
तब पैर थक जाते थे मेरे ।
जीत कर मिली जो कुर्सी तोवो
*, बहुत औपचारिक हो गये हैं।*
अब न मुंह लगाते किसी को
बहुत ही व्यवहारिक हो गये हैं।
हर समय हैं ऐंठ में रहते वो
अब जैसे खुदा वो हो गये हैं।
अब उनके साथ हम भी
*बहुत औपचारिक हो गये हैं।*
जिस घर से कोई अब
कमाये विदेश में पैसा।
अकड़े रहते वो हरदम
मुंह बनाते फुटबॉल जैसा ।
हाय, हेलो ही करते गर्व से
*बहुत औपचारिक हो गये हैं*।
ज़माना इस कदर आगे बढ़ा
फुर्सत नहीं है मिलने की ।
अपने बच्चों संग भी अब
फुर्सत कहां बात करने की।
मां बाप से मिलने में भी अब
*बहुत औपचारिक हो गये हैं*।
रिश्ते नातो में भी अब
दिल के तार कहां जुड़ते हैं।
जो निकल गये हैं आगे
वो पीछे कहां मुड़ते हैं ।
दोस्त ही अब दोस्त से
* बहुत औपचारिक हो गये हैं *
कभी प्यार की कसमें खाते थे
और जीते थे प्यार को।
अब वो दिल ही न रहे
तो कैसे निभायें प्यार को ।
प्यार करने वाले भी अब
*बहुत औपचारिक हो गये हैं*।
No comments:
Post a Comment