Wednesday, June 9, 2021

सूर्य प्रकाश पाटिल की रचना- अकिंचन

रचनाकार सूर्य प्रकाश पाटिल
जिला बेमेतरा
विषय अकिंचन
विधा छंद मुक्त कविता
दिनांक 09/06/21

            अकिंचन 
हैं अकिंचन वे प्रभु
जिनके मन आपका वास नहीं।

हैं अकिंचन वे प्रभु,
जिसके मुख आपका नाम नहीं।

सब कहते मुझे अक़िंचन,
पर मन से में अकिंचन नहीं।

आप बसते हैं इसमें प्रभु,
तो हृदय से मै अकिंचन नहीं।

लोग कहते हैं दरिद्र,
और ठोकरें भी देते प्रभु।

पर आप के क़दमों तले,
मै दरिद्र हूं नहीं।

मन में बसते आप सदा,
मन भरा हैं आपसे।

मुझसे बड़ा भाग्यवान,
मुझे लगता कोई नहीं।
          सूर्य प्रकाश पाटिल

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