बाँदीकुई(दौसा)राज
विषय-महाराणा प्रताप
विधा-सरसी छन्द
महाराणा प्रताप
विधा-सरसी/समुंदर/कबीर छन्द
मात्रा भार-27/यति-16-11,पदान्त 21
रजपूती मेवाड़ धरा का,
राणा जैसा वीर।
हार नहीं मानी थी जिसने,
चाहे सह ली पीर।।
राष्ट्र धर्म को अपनाया था,
उसकी थी यह आन।
रखा सदा ऊँचा इस जग में,
मातृ भूमि का मान।।
अरि का शीश झुकाया रण में,
भरी एक हुंकार।
काँप गया धरती अम्बर भी,
सुन उसकी ललकार।।
चेतक घोड़ा था राणा का,
करे हवा से बात।
भाला भी राणा का ऐसा
काटे अरि के गात।।
मेवाड़ी माटी के चर्चे,
गूँजे थे दरबार।
अरि के शोणित की प्यासी थी,
राणा की तलवार।।
चेतक की टापों को सुनकर,
काँपे हर अरि गात।
हल्दीघाटी युद्ध लड़ा था,
राणा जग विख्यात।।
शूरवीर राणा मतवाला
सदा रहेगा याद।
कम न हुई यश गाथा जिसकी,
इतनी सदियों बाद।।
राष्ट्र भक्ति राणा की अद्भुत,
नहीं झुकाया सीस।
एक वार में मारे अरिदल,
एक नहीं दस बीस।।
सदा सदा नभ में गूँजेगा,
राणा का यश गान।
भरा हुआ जिसकी रग रग में,
मातृभूमि सम्मान।।
अनुपम अद्भुत साहस उसका,
वह धरती का लाल।
झुकने नहीं दिया था उसने,
भारत भू का भाल।।
*डॉ एन के सेठी*
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