Wednesday, June 2, 2021

गोमती सिंह कृत लघुकथा- परामर्श

लेखिका-गोमती सिंह 
जिला-कोरबा छत्तीसगढ़ 
विषय-परामर्श 
विधा-लघु कथा 
शीर्षक-यादों का झरोखा 
----सुबह के लगभग 6 बज रहे थे, सूर्योदय हो चुका था,  गौरैया और मैना की चूँ चूँ की आवाज़ बोधराम के कानों में आने लगी,  तब सुबह होने का संकेत समझकर बोधराम घर से बाहर निकले । 
          और अंतिम अवस्था के अकेलेपन को कोसते हुए कंपकपाते हाँथों से एक कुर्सी लाकर घर के सामने धूप में आकर बैठ गए। 
        वैसे तो बोधराम ने अपने बच्चों के बिना जीना सीख लिए थे,  मगर फिर भी आज उनको अपना भरापूरा परिवार याद आने लगा। 
            बात उन दिनों की है जब सुबह होते ही  सोनकुंवर चाय बनाती थीं और तभी सायकिल में पों पों की आवाज़ बिखेरता ब्रेडवाला आ जाता था,  बोधराम अपने कुर्ते की जेब से दस रूपये निकालते और एक पैकेट ब्रेड लेकर अपनी पत्नी सोनकुंवर को दे दिया करते थे।  सभी बच्चे चाय ब्रेड की चाहत में बिस्तर छोड़ दिया करते थे ।और उनके घर भी सवेरा हो जाता था ।
        इन्हीं सब बातों को याद करते हुए आज वर्षो बाद 70 वर्षीय बोधराम के होंठों पर मुस्कान की लकीर खींच गई ।जो उन वयोवृद्ध के होंठों पर ठहर न सकी और पानी में पड़े बुलबुले की भांति चंद सेकेण्ड मात्र में खो गए। 
           मगर बोधराम ने अपने अधरों में आए मेहमान रूपी मुस्कान को रोकना चाहा , और यादों के झरोखे से झांकने लगे। 
         तब उन्हें वह दृश्य लुभाने लगा; जब हरेली के त्यौहार में आधा किलो बेसन खरीद कर लाते थे और सोनकुंवर पकौड़े बनाती थी , और अपने बच्चों के साथ अपने झोपड़ी नुमा घर में बड़े मज़े से त्यौहार मनाते थे ।
         फिर धीरे धीरे वह भूतकाल से वर्तमान में आ गए। 
        किस तरह वह रोज़ी मजदूरी करके अपनें सभी बच्चों के ब्याह कराए थे ।
          गाँव में ऐसे अनेक गरीब बोधराम होते हैं जो अपने बच्चों के ब्याह कराए देना अपनी सबसे बड़ी जिम्मेदारी समझते हैं । उनकी हालत ऐसी होती है  कि वो उच्च शिक्षा के बारे में सोच भी नहीं सकते । 
             उम्र की ढलान में आते आते दोनों लड़कियों को ससुराल विदा कर दिए और दोनों लड़कों को शहर का सांप सूंघ गया। 
        उन दोनों को अपने पिताजी जैसा खेत खलिहान  में मेहनत करना पसंद नहीं आया। और वो शहर की ओर पलायन कर गए।  
          पता नहीं क्यों आज के इस युग में सभी वर्गों के लोगों के दिल दिमाग में सिर्फ शहरी वातावरण भाने लगा है। 
         गाँव की वो सुंदरता, प्राकृतिक छटा नदी तालाब में तैर कर नहाना तालाब के किनारे घंटों बैठ कर हास-परिहास करना आदि समस्त सुख से वंचित हो रहे हैं। प्रकृति से प्रेम केवल कवि और लेखकों की कल्पना मात्र बनती जा रही है।
स्वयं प्रकृतिआज   परामर्श देना चाह रही है कि  प्रकृति से प्रेम  करो , प्राकृतिक धरोहरों का संरक्षण करो गाँव की सुखमय जीवन से मुंह न मोड़ो। यह भयावह महामारी प्रकृति के दोहन का ही परिणाम है। 
        और इस तरह धूप तमतमाने लगा तब बोधराम अपनी एकमात्र सहारा अपनी पत्नी  सोनकुंवर को पुकारते हुए घर के अंदर चले गये और यादों का झरोखा बंद हो गया। 
        ।।इति।।
गोमती सिंह 
कोरबा, छत्तीसगढ़

2 comments:

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