Friday, May 21, 2021

मोनालिसा बेहरा की रचना- माँ

रचियता-मोनालिसा बेहरा
सुंदरगढ़, ओडिशा
विधा-काव्य
विषय-माँ

माँ का अर्थ समझा  दूँ मैं
वो भाषा,परिभाषा कहाँ से लाऊँ?
माँ को शब्दों में बांध दूँ मैं
वो शब्दकोश कहाँ से पाऊँ?
निज पीड़ा व्यथा को भूल जो
निस्वार्थ करती प्रेम है
माँ की आकार कोई क्या समझे
वह तो प्रभु की अनमोल देन है
हर रूप स्वरूप में माँ है
रग-रग में बसी आत्मा है
जन्म देती ,जीना सिखाती
उंगली थाम चलना सिखाती
कर्तव्यपथ पे आगे बढ़ाती
माँ धरा की परमात्मा है।
माँ है तो सब अपना है
माँ है तो सच हर सपना है
बिना बताए हर दर्द समझ जाती है
जाने कहाँ से उपचार ढूंढ लाती है
बच्चे के आने के संकेत से ही
उसकी रक्षा की ढाल बन जाती है
भूल जाती है अपने सपनों को
सदा दुआओं में हमारी खुशी मांगती है
माँ का करो ना अनादर कभी
रखो ख्याल जैसे रखा था उसने कभी
एक माँ-बाप ही हैं जो मिलते नहीं
धरा पर दुबारा कभी।।

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