विधा:-कविता (छंदमुक्त)
विषय:-हाथी
शीर्षक:-हाथी भइया
हाथी भइया हाथी भइया,
रहते सदैव तुम तन कर खड़े।
लंबी पूँछ और छोटी आँखे,
दाँत और कान हैं बड़े बड़े।
हाथी भइया हाथी भइया,
इतने केले क्यूँ खाते हो।
खाना अगर न मिले तुमको,
सब तहस नहस कर जाते हो।
हाथी भइया हाथी भइया,
पीठ पर क्यूँ न बिठाते हो।
कितने अच्छे कितने भोले,
सूंड में पानी भर नहाते हो।
हाथी भइया हाथी भइया,
ऐसे प्यार तुम जताते हो।
कभी सूंड से उठा लेते तुम,
कभी सूंड से सहलाते हो।
सीधे सादे प्यारे प्यारे,
इसलिए मन को भाते हो।
-कु.गरिमा पोयाम
No comments:
Post a Comment