जिला-रायपुर
विषय-चेतिका
विधा-छंदमुक्त कविता
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जिंदगी जीने के लिए, पलाश ढूँढती है|
मौत की जिद है ,हजार लाश ढूँढती है|
गलियों में आज ,इतनी वीरानी है क्यों,
मोहल्लों में घूमती हुई, काश ढूँढती है|
मैंने अपने दिल की, धड़कन से सुना तुम्हें,
इसलिए दिल तुझमें ,सबसे खास ढूँढती है|
तेरी आँखों में आई है, उदासी की लकीरें,
मेरी आँखें उन आँखों में, आस ढूँढती है|
किताबों में सजती है, मुरझाए फूलों की चेतिका,
श्मशान तो जिंदा जिस्म उदास ढूँढती है|
अमिताभ कुमार दीवान
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