जिला - जांजगीर चाम्पा (छ ग)
विषय - जहाज
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नील गगन के नीचे उड़ता जाऊँ,
मुसाफिरों को मंजिल तक पहुँचाऊ।
मुझमें बैठकर आसमान की सुन्दता दिखती खूब,
नीचे रहूँ तो बड़ा दिखू, आसमान में उड़ते ही पंछी सा बदलू रूप।
कुछ ही घंटों में मीलों की दूरी तय करता हूँ,
मौसम में न दिखे खराबी तभी अपनी उड़ान भरता हूँ।
दुनिया का सुन्दर नजारा सबको दिखाऊ,
नील गगन के नीचे उड़ता जाऊँ।
समुन्दर की गहराइयाँ नापते मीलों दूरी तय करता हूँ,
दो देशों के बीच आयात निर्यात के संबंध को बढ़ाता हूँ।
मेरे अंदर रहता सारी जीविका का साधन,
सबको अपने घर जैसा सुविधा दिलाऊ ऐसा हूँ मैं वाहन।
अपने देश के लिए हर युद्ध में मैं लड़ने जाऊँ,
नील गगन के नीचे उड़ता जाऊँ।
मैं ही अंतरिक्ष तक पहुँचाऊ,
चाँद तारों की सैर कराऊँ।
नील गगन के नीचे उड़ता जाऊँ...
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"श्वेता सिंह क्षत्रीय"
जांजगीर
बहुत सुन्दर कविता
ReplyDeleteNice
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