जिला-कोरबा, छ.ग.
विषय- संगम
विधा- छंद मुक्त कविता
शीर्षक- संगम
---नदियों में संगम होता है ,
क्यों मानवों में नहीं होता !
गर मानव मन में संगम होता,
भवसागर सुखमय हो जाता ।
प्रकृति स्वच्छ है ;
उनमें मलिनता नहीं होती,
क्यूँ मानव मन भी प्रकृति के ;
स्वच्छतासे प्रेरित नही होते ।
नदियों में विवेक कहाँ!
वो पवित्र ढाल में बह जाती हैं ,
मानव विवेकशील होकर भी ;
महज स्वार्थ में गति करते हैं।
ईश्वर से हम मन्नत मांगे ;
मानव मन भी पावन हो जाए ,
फिर परिवार, समाज और राष्ट्र मिलाकर ,
विश्व का संगम हो जाऐ ।
विश्व का संगम हो जाए ।
।।इति।।
" गोमती सिंह "
कोरबा, छ.ग.
बहुत सुंदर कविता ।
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