जिला कोरबा ,छ.ग.
विषय--दार्शनिक एवं दार्शनिक दृष्टिकोण
विधा- आलेख
शीर्षक-दर्शन
----मानव चिंतन के नवप्रभात मे जब वैदिक ऋषियों ने अपने चारों ओर नदी, वृक्ष ,पर्वत, सागर आदि प्रकृति के विभिन्न अंगों पर दृष्टि डाली तब उन्हें प्रकृति की ब्यवस्था पर अत्यधिक आश्चर्य हुआ ।
...यही आश्चर्य दार्शनिक दृष्टिकोण का.प्रमुख लक्षण है।
....गौतम बुद्ध, वेदों के ऋषि मुनियों , तथा पश्चिमी दार्शनिक देकार्ते के दार्शनिक दृष्टिकोण के निम्न लिखित लक्ष्ण स्पस्ट होते हैं---
1-आश्चर्य की भावना
2-संदेह---दार्शनिक दृष्टिकोण अंधविश्वास के विरुद्ध वह प्रत्येक विश्वास की समीक्षा करता है । इसलिए नहीं कि संदेह करना दार्शनिक आदत है बल्कि इसलिए कि वह प्रत्येक बात के मूल रुप से ठोस कारण की प्रमाणों की खोज करता है।
३--समीक्षा- दार्शनिक दृष्टिकोण समीक्षात्मक होता है ।
4--चिंतन --समीक्षा के लिए चिंतन की आवश्यकता होती है अतः दार्शनिक दृष्टिकोण चिन्तनात्मक होती है ।
5--तटस्थता - दार्शनिक न तो संदेहवादी होता है न ही अंधविश्वासी वह तटस्थ भाव से चिंतन करता है ।
दार्शनिक निरंतर चिंतन करते जाता है । और कौई भी वस्तु की चिंतन की कोई सीमा नही होती अतः दार्शनिक दृष्टिकोण जीवन पर्यन्त चलते रहता है ।
दर्शन की उपरोक्त सभी विधियों पर चिंतन करनेवाले को दार्शनिक कहा जाता है ।
।।इति।।
" गोमती सिंह"
कोरबा , छ.ग.
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