Thursday, March 18, 2021

मीराआर्ची चौहान की रचना- बसाहट

रचयिता-मीराआर्ची चौहान
जिला-कांकेर,छग
शीर्षक- बसाहट
विधा- कविता (मुक्त छंद)

अब  गांवों को छोड़ कर लोग
   शहरों में  ही बसने लगे हैं ।

ग्रामीण परिवेश  पसंद नहीं,
   परिवार  ही छटने लगे हैं ।

कैसे कहें कि शहर की उन्हें
   हवा लग गई है लुभाने।

गांव की जनसंख्या हर दिन,
   कम हो रहे घटने लगे हैं ।

बसाहट थी गांवों की रौनक 
   पथ निर्जन लगने लगे हैं ।

अपनी धरती से पलायन कर,
   लोग बेगाने लगने लगे हैं ।।

मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग

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