स्थान -नवापारा खुर्द /सक्ति
जिला--- जांजगीर-चांपा -छत्तीसगढ़
विधा---आलेख /कविता /ग़ज़ल
विषय-निराकार
शीर्षक-निराकार भी साकार भी
सुनो कहने वालों का क्या क्या कह रहे ।
हम सब का ध्यान लगाके आगे बढ़ रहे ।
ईश्वर है नहीं है बताओ, हम क्या प्रमाण देंगे ।
अगर हम देना चाहेंगे, हमको जड़ से उखाड़ देंगे ।
जिसकी लाठी उसकी भैंस ,हमने सुन रखी है ।
जिसके पास में है सब ,आपस में लड़ रहे हैं ।
युगों-युगों से बंटने बांटने, का काम चल रहा है ।
कही यह मशाल बुझा हुआ ,कहीं जल रहा है ।
कई इसके बिल्कुल करीब ,कोई दूरी बनाए हैं ।
मिल रहे सबको सम ,यह फूल फल भी रहे हैं ।
पहले भी भिन्न भिन्न मन वाले थे और आज भी ।
पहले भी हुआ काज और चल रहा है आज भी ।
अंधेरे उजाले में सब रोशनी बिखरने में लगे हुए ।
कहते हैं दुनियां हम सब मिलकर बदल रहे हैं ।
साकार और निराकार रुप की, महिमा सब बखान रहे ।
हम मानने वालों में है, जिस रुप में यहां भगवान रहे ।
पक्ष विपक्ष हमारे नहीं, चाहे कुछ भी कहता इंसान रहे ।
सुख दुख उसी की देन, मानकर सब जीवन भर सह रहें हैं ।
कैसे विचार आते मन में, कैसे ये पनपने लग जाते हैं ।
कभी साथ रख लेते खुद के, और कहीं दूर हटाते हैं ।
सुबह आती और जाती शाम का भी होता आना जाना ।
उसी के अनुरूप हम हर पल बन और बिगड़ रहे है ।
No comments:
Post a Comment