ग्राम-बुलाँकी
जिला- रायगढ़ (छ.ग.)
विधा -कविता
विषय-निराकार
दिनाँक-08/03/2021
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"तुझे समझने लगी हूंँ"
तूझे पहले से ज्यादा समझने लगी हूंँ,
खयालों में तेरी मै डूबने लगी हूँ।
साकार रूप में तू जड़ चैतन्य है,
निराकार रूप में तू व्यापक है ।
तू साम्य उर्जा ,तू ही निरपेक्ष ,
तू अभेद है, तू ही अनंत।
तेरी महिमा को मैं समझने
लगी हूँ।
खयालों में तेरी मैं डूबने लगी हूंँ।
अस्तित्व स्वरूप में अस्तित्व है,
सहअस्तित्व ही अस्तित्व है ।
मैं तुझमें हूंँ तू मुझमें है ,
जड़ चैतन्य में तू ही तू है ।
अब तेरी वैभव पहचानने लगी हूंँ।
खयालों में तेरी डूबने लगी हूंँ।
तू परमब्रह्मा ब्रह्मांड है तुझमें,
मैं हूँ तुझमें ,तू है मुझमें ।
जड़ में तू क्रियाशील रूप है,
मानव में तू ज्ञान स्वरूप है ।
तेरी ऐश्वर्य समझने लगी हूंँ ,
खयालों में तेरी डूबने लगी हूँ।
तू परमात्मा सूक्षतम स्वरूप है,
तू नित्यानंद तू अरूप है।
तू नित्य वर्तमान तू ऊर्जा है,
तेरी ऊर्जा से मैं उर्जित हूंँ।
तेरी गरिमा समझने लगी हूंँ।
खयालों में तेरी डूबने लगी हूंँ।
अनुभव काल में आनंद स्वरूप
है,
विचार काल में समाधान रूप है।
व्यवहार काल में न्याय स्वरूप है,
व्यवसाय काल में नियम रूप है।
तेरी स्वरूप पहचानने लगी हूंँ,
खयालों में तेरी डूबने लगी हूंँ।
उर्मिला सिदार
बुलाँकी रायगढ़ छत्तीसगढ़
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