रचनाकार। श्रीमती रजनी शर्मा
बस्तरिया
जिला। रायपुर छत्तीसगढ़
विधा। मुक्त छंद
शीर्षक। पिंपिलिका करे
उदरस्थ व्रीहि
यूं ही नही उपजता व्रीहि,
खनित्र के आघात,
आखन कि कुठाराघात,
दात्र पर शीश नमन,
तब माटी करती उपजन।
सुहलि चलाते जब हल,
दुर्हलि का हो पंकदमन,
तोत्र संग वृषभ का चलन,
व्रीहि का तब हो उत्पादन।
श्रमतपा बनके ग्रैष्मक,
शीतगम्य बनके वासंतक,
झूमे झरे झर तब ब्रेहेस,
बाली व्रीहि का हो सहस्र,
षालेय पाके ले अलाव,
उम्य उगे जब भू पर,
तिल तरोहित हो तिल्यी,
पिंपिलिका करें उदरस्थ व्रीहि।
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