जिला-कांकेर,छग
शीर्षक- संकल्प
विधा-कविता( मुक्त छंद)
निराशा की अब चादर न ओढ़,
उठ, निकल बढ़ आलस छोड़।
मुश्किलें तो आयेंगी डगर पर,
हौसले रख अपनी दिशा मोड़।
मंज़िल को अगर पाना है चल,
दृढ़ संकल्पित अपना मन रख।
कट जाएंगी दुविधा की बेड़ियां,
राह के पत्थरों को ठुकरा भी दे।
मंज़िल पग चूमेगी परिश्रम कर,
अगर आज नहीं तो निश्चित कल।
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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