रचनाकार -अमिताभ कुमार दीवान
स्थान - रायपुर छतीसगढ़
विषय - मोक्ष
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कभी कैलाश से आते हैं, कभी कैलाश जाते हैं|
रहे घट घट में अवगढ़ जो, वही शिव कहलाते हैं|
बैठा है उनके द्वार पर, एक द्वारपाल नाम है नंदी
बिना उसकी सहमति से, कोई उनसे नही मिल पाते हैं|
मोहब्बत में सभी सुनिए, साँसे बोलती है क्या|
जो दूल्हे बने शम्भू ,तो बारात बोलती है क्या|
अधर लरज़ा गए देखकर, शरमा गयी गौरी,
आँखों ने कहा था कुछ ,ना जाने आँखों से क्या|
मुझमें ही गिरिजा है, मुझमें ही शंकर है|
हर जगह मेरा वास, क्या कण कण, क्या कंकर है|
अर्द्धनारीश्वर कहते हैं, मुझे हर नर, हर नारी
हर नारी में मैं नर हूँ, हर नर में मैं ही नारी|
मुझमें ही जन्म भी रहता ,मृत्यु भी समाहित है|
यूँ तो हूँ मैं सृजनकर्ता ,मुझमें ही तबाही है|
मैं ही तो हूँ जीवन मृत्यु के हर रस्म निभाता हूँ
मैं ही हूँ हर रस्म भस्म करके मोक्ष दिलाता हूँ
अमिताभ कुमार दीवान
रायपुर छतीसगढ़
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