रचनाकार-एच-एस-अरमो ,अरमान ।
निवास-बायरन बाज़ार,रायपुर ।
जिला-रायपुर,छत्तीसगढ़ ।
विषय-"" धरा "" ।
विधा- छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक- धरा ।
दिनाँक-23/03/2021, मंगलवार ।
=====*************=======
○•○•○•|| धरा ||•○•○•○
☆☆☆☆☆
धरा है,माँ समान---
प्राकृतिक संसाधनों की भंडारी ।
उर्वरा शक्ति की है, सत्ताधारी,
माँ ही होती,परिवार की महतारी ।
धरा है, जगत में---
पानी की मात्रा से, है कम,
फिर भी हुआ न ,अब भी,
जगत में तेरा मान-सम्मान कम ।
तू है, तभी तो---
रहती है,प्रकृति में हरियाली ।
शुद्ध पर्यावरण व लाती है खुशहाली,
मानव जाति की तू है,सतत् प्रवाही ।
धरा ने ही,लोगों को जोड़ा-तोड़ा है--
कभी,परिवार को, बँटवारे के नाम,
तो,देश को,उसके विभाजन के नाम ।
धरा में हैं, खूबसूरत से नजारे--
पर्यटन स्थलों को हैं सजाते,
ये,पर्यटकों को,आकर्षित हैं करते,
उनके मन को,प्रफुल्लित हैं करते ।
धरा का,हमें जीवन है बचाना---
और उसके,अति-दोहन को है,रोकना ।
वृक्षारोपण से,उसे पल्लवित है करना ,
सहअस्तित्व, प्रकृति सन्तुलन बनाना।
धरा के गर्भ में ,छिपे हैं--
अनमोल खनिजों के खज़ाने,
और हैं,मृदु जलों के भंडारे ,
विविधता के मिलते हैं नजारे ।
देशभक्ति व मातृभूमि का गौरव--
बलिदानियों ने,अपने उत्सर्ग से कराया,
उस पल,माताओं की,गोदें हुई थी सूनी
धरा रक्षा के लिये,वे थे महान् सेनानी-।
धरती माँ,इतना कष्ट सहती--
और जीव-जन्तुओं को,जीवन देती।
मिलजुलकर रहने की,देती हैं सीखें,
उपजें उगाने,किसान अपने श्रम सीचें।
धरा है,तो ही--
हमारा-तुम्हारा अस्तित्व है,पर
शहरीकरण ने,निगल लिया है,
कृषि भूमि को भी व उपजें हैं घट,
खाद्य-संकट की,बनी हैं मरघट--।
No comments:
Post a Comment