रचनाकार-आशा अतुल गुप्ता
स्थान नौगाँव (म.प्र.)
विधा-कविता
शीर्षक-धरा
दिनांक-23/03/2021
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*धरा*
हे माँ जननी धरा हमारी
बारम्बार तुझे प्रणाम.
तेरी गोद में पलते देखो,
जाने कितने गोरव प्राण।
कल-कल बहती नदियाँ ,
सागर जल से भरे विशाल।
सुन्दर वनों की छटा निराली,
जिसमें सम्पदा मिले अपार।
भाँति - भाँति के जन्तु बसे है,
जिसका पोषण करती तू।
तेरी प्यार की छाँव तले,
जीता है सारा संसार।
हरे-भरे ये खेत खलिहान,
कहीं खड़े है पर्वत विशाल।
कहीं ताल कहीं बहता झरना,
कही बर्फ के पहाड़ विशाल।
रंग-बिरंगे फूलों से महकें,
तेरा आँचल हरा - भरा।
अन्न के भण्डार भरे है,
कभी न खाली होता जो।
तेरा कर्ज चुकाऐं कैसे,
कैसे तेरा करू बखान।
तेरे गर्भ से देखो कितने.
जन्म लेते है मानव वीर।
कितने दुखों को सहकर भी तू,
खुशियाँ देती हमें अपार।
तूझ पर कोई वार करे तो,
उससे भी लड़ जाऐं हम।
हे माँ जननी धरा हमारी,
बारम्बार तुझे प्रणाम।
तेरी गोद में पलते देखो,
जाने कितने गौरव प्राण।
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