जिला- कोरबा, छ.ग.
विषय-ढलैत
विधा-छंद मुक्त कविता
शीर्षक-ढलैत
--- जीवन सफल तभी होगा ,
जब ज्ञान, संस्कार का ढाल होगा ।
हमें भी शिखर में जाना है ,
पहचान अपनी बनाना है।
इस नये युग के तराने में,
सुर अपना भी देना है ।
चाहे लाख दरिंदे हो ,
या नर -पिसाच का घेरा हो,
मर्यादा का ढाल थामकर, हमें स्वयं ढलैत बन जाना है ।
आँखों में सुरमा सपनों का ,
हौसलों का पैजन पहनेंगे ।
कौन कह सकता है , अब हमको ;
अपनी जीवन रक्षा हेतु हम , खुद ढलैत बन जाएंगे।
छोड़ दिए घुंघट का जमाना ,
सर में साफा कफन का बांधे हैं,
मर्यादा हनन करे गर कोई ,
सर धड़ से अलग करते जाएंगे ।
शील का ढाल धारण करके ,
दुनियाँ फतह कर जाएंगे ।
अपनी जीवन रक्षा हेतु,
हम खुद ढलैत बन जाएंगे ।
।।इति।।
" गोमती सिंह "
कोरबा, छ.ग.
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