रचनाकार-गोमती सिंह
जिला-कोरबा, छ.ग.
विषय-धरा
विधा-छंद मुक्त कविता
शीर्षक- हे माँ धरणी
----- हे माँ धरणी ! हे माँ वसुंधरा ,
गेहुंआ रंग है मुखमण्डल तेरा।
हरियाली की चुनर ओढे ,
कितना अनुपम रुप है तेरा ।
दिल में तेरे शोले रहते ,
मुख मे.ठंड़क का है बसेरा ।
कितनी शीतलता माँ तेरे तन में ,
लाखों कष्ट सहन करके ,
वात्सल्य लबालब तेरे मन में ।
तेरे आँचल में माँ ! भरी है अन्न की थाली ,
सीने में वार सहन करके जल की फौव्वारा देती ।
भोर के प्रथम जागरण में माँ !
हम तेरा वंदन करते हैं ।
तब फिर तेरे सतह में माँ कदम रखा हम करते हैं ।
हे माँ! तेरी ममता का.मोल कैसे चुकाएंगे !
एक राह सुझता है माँ!
निज हाथों से हम वृक्ष एक लगाएंगे ।
।।इति।।
" गोमती सिंह"
कोरबा, छ.ग.
Very nice 👌
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