Thursday, March 18, 2021

मोनालिसा बेहरा की रचना- बसाहट

रचियता-मोनालिसा बेहरा
सुंदरगढ़, ओडिसा
विधा-काव्य
विषय-बसाहट
शीर्षक-आसान नही होता....


जिस गांव के गली-गली में
बसती है अपने कदमों की आहट
आसान नही होता छोड़ सब कुछ
किसी दूसरी नगरी में बसावट
बदल जाती है पता ठिकाना
खो जाती है अपनी हस्ती
आदत होती है जिन चेहरों की
गुम हो जाते हैं वे भी कहीं
ना सुबह का राम-राम होता है
ना शाम की जमती है चौपाल
नए शहर की नई बसावट
कुछ भी दिनों में बन जाती है
अंतर्मन की कसमसाहट
शुरू होती है फिर जद्दोजहद 
अपनी पहचान बनाने की
अजनबी शहर के अजनबी लोगो में
अपनेपन तलाशने की।
बर्षों गुजर जाते हैं खुद को समझाने में
अपनी जड़ों से अलग होकर 
फिर से नई जड़े जमाने में
कोलाहल और चकाचौंध की ये दुनिया
दूर के ढोल ही साबित होते हैं
सुकून के बदले बैचेनी ही देते हैं
आसान नही होती है बसाहट
जड़ो से अलग होने की
सदा रहती है दिल में छटपटाहट।।

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