संबलपुर,जिला-कांकेर, (छ. ग.)
विषय- *मखमल* विधा-आलेख
दिनाँक-12.03.21
*मखमल*
मखमल का शाब्दिक अर्थ- "हल्की बुनाई के रोएंदार रेशमी कपड़ा"। इसे साधारण रेशम के रोएंदार सतह पर बनाया जाता है । यह सतह बुनाई के समय ऐंठे हुए रेशमी धागों को अलग-अलग करके बनाया जाता है ।अलग होने पर यह धागा गुच्छे के रूप में रेशमी, सूती या कोई और भी कपड़े के मजबूत आधार पर टिका होता हैं।प्राचीन समय में मखमल कपड़े काफी लोकप्रिय थे।यह राजकीय वेशभूषा के रूप में जाना जाता था। पर्दा, सोफा के गद्दे ,और लिहाफों के खोल के रूप में इसका उपयोग होता है। इसे मसलीन भी कहा जाता है ।यह शब्द मसलीपट्टनम नामक भारतीय पत्तन से आया है ।
उन दिनों ढाका का मखमल बहुत प्रसिद्ध था। वह इतनी महीन होती थी कि साड़ी भी अंगूठी से निकल जाता था। मगर अंग्रेजों के खराब व्यापारिक नीति के कारण यह उद्योग नष्ट हो गया ।यह बहुत कोमल सूत और हाथ से बुनी जाती थी। अविभाजित भारत और आज के बंगलादेश में मख़मल व्यापार का मुख्य केंद्र था ।17 वीं,18 वीं शताब्दी में भारत का मखमल का पूरे यूरोप महाद्वीप में निर्यात होता था।
मखमल के कपड़ों का बनावट नरम, पतला और पारदर्शी होता है। पहनने पर बड़ा आरामदेह होता है। उच्च तापमान संकोचन उपचार के बाद यह खराब भी नहीं होता, तथा इसमें शिकन भी नहीं पड़ता। अच्छी हवा पारगम्यता और ड्रेप वेलवेट प्लंप और चिकनी मोटी,बनावट नरम,पहनने के लिए प्रतिरोधी और टिकाऊ होता है। मखमली सूत के अनुसार *ताना* मखमल और *बाना* मखमल के रूप में इसे विभाजित किया जाता है।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर, (छ. ग.)
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