जिला/राज्य - जांजगीर चांपा (छ ग)
विषय - *बसाहट*
शीर्षक - *ऐसी हो बसाहट*
एक दूसरे के दिलों की, मिलती रहे आहट।
ऐसी होनी चाहिए, हम सब की बसाहट।।
सुख हो या दुख हो, साथ में रहना है।
क्योंकि अब तो, यही जीना यही मरना है।
यहाँ रहने वाले लोगों के, प्यार में न हो कोई मिलावट।
ऐसी होनी चाहिए, हम सब की बसाहट।।
अमीर हो या गरीब, सब में हो एक दूसरे के लिए प्यार।
इस छोटी सी दुनिया में, बसता है इनका संसार।
घर नहीं सपनों के महल, जैसे हो इसकी बनावट।
ऐसी होनी चाहिए, हम सब की बसाहट।
एक दूसरे के लिए, मर मिटने को ये तैयार हो,
न कोई लड़ाई, न कोई झगड़ा, सरल इनका व्यवहार हो।
आपस में जब भी मिले, चेहरे पे हो मुस्कुराहट।
ऐसी होनी चाहिए, हम सब की बसाहट।।
रात के अंधेरों में भी, जहाँ न कोई हो भय,
शांत मन से सोता रहे, हमारा शरीर और हृदय।
सारी दुनिया की सुन्दरता इसमें समा जाए,
बस इतनी सी है हमारी चाहत।
ऐसी होनी चाहिए, हम सब की बसाहट।।
बहूत शानदार कविता।
ReplyDeleteबहुत ही शानदार रचना
ReplyDeleteBhut hi pyari Kavita h...pdhne k bad bhut Acha laga
ReplyDeleteBahot Sunder kavita behtareen
ReplyDeleteसुन्दर रचना
ReplyDeleteWah qya khub likhti ho
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