जिला- कोरबा,छ.ग.
विषय- कानन
विधा- छंद मुक्त कविता
शीर्षक- कानन
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हे कानन के वृक्ष लताओं !
कैसे हो कुछ अपनी गाओ ।
कानन से आवाज ये आई ,
हम रहे सदा तुम्हारे सुखदायी ,
फिर भी अब हम भाते नही तुमको,
तुम्ही बताओ कारण भाई !
हमसे निर्भर श्वांस तुम्हारा,
हमीं से पाते अपना बसंत प्यारा ।
हम ही देते वर्षा तुमको ,
हमसे ही तुम्हारा जीवन धारा ।
फिर भी हमारा हनन किए तुम,
भीषण गर्मी सहो जी अब तुम ।
हे इस युग के मानव प्राणी !
कानन रहित अब हो गई है धरणी ।
कभी रहती थी जो मनोहर रमणी ।
हम क्या गाएं अपनी गाथा,
तुम्ही बताओ अब अपनी ब्यथा ।
बोल पड़ा तब मानवप्राणी -
हे कानन तुम देव समाना ,
मुल्य तुम्हारा हमने नही जाना ।
तुम्हें काटकर हम तड़पे हैं
सुंदर वन को हम तरसे हैं ।
अब है एक उद्देश्य हमारा,
वृक्ष लगाना वृक्ष लगाना ।
।।इति।।
" गोमती सिंह "
कोरबा, छ. ग.
बहुत सुंदर कविता, इस कविता में कवियित्री महोदया ने वृक्षों और मनुष्यों के संबंध का वर्णन किया है चूंकि ज्ञान मनुष्यों में ही होता है इसलिए वृक्षों की रक्षा करने की जिम्मेदारी उन्ही को दी जाती है
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