Wednesday, March 10, 2021

मीराआर्ची चौहान कृत आलेख- विनाह

रचयिता-मीराआर्ची चौहान
जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-  *विनाह*
विधा-आलेख

प्राचीन काल से हमारे पूर्वज जल के विभिन्न स्त्रोतों,संसाधनों के संरक्षण हेतु सजग व तत्पर रहे हैं । चाहे नदी हो या जलाशय  , कुएं हों या नलकूप।लोग पेय जल की सुरक्षा हेतु जागरुक रहते थे ।
*विनाह* का शाब्दिक अर्थ है-कुएं का ढक्कन या जाली।
प्रायः अधिकांश घरों में कुएं होते थे,जिनसे पीने,नहाने व सब्जी उगाने के लिये पानी की पर्याप्त व्यवस्था हो जाती थी ।इन कुओं में  धूल व कचरे  व पेंड़ के पत्ते आंदर न जाए, छोटे-छोटे बच्चे,जीव-जंतुओं को क्षति न हो इसलिए लकड़ी के तख्तों का मजबूत ढक्कन या महीन जाली लगा दिया जाता था ,जिसे *विनाह* कहा जाता था ।
अब तो कुआं भी विलुप्ति के कगार पर हैं ।विनाह के केवल अवशेष शेष रह गये हैं ।
आईए  प्राचीन जल स्त्रोत कुएं का संरक्षण करें।विनाह भी लगाये ताकि कोई दुर्घटना न हो ।कुएं का पानी प्रदूषित न हो व कुएं के जल  की स्वच्छता बनी रहे ।

मीराआर्ची  चौहान
कांकेर,छग

No comments:

Post a Comment

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...