जिला-कांकेर,छग
शीर्षक- *विनाह*
विधा-आलेख
प्राचीन काल से हमारे पूर्वज जल के विभिन्न स्त्रोतों,संसाधनों के संरक्षण हेतु सजग व तत्पर रहे हैं । चाहे नदी हो या जलाशय , कुएं हों या नलकूप।लोग पेय जल की सुरक्षा हेतु जागरुक रहते थे ।
*विनाह* का शाब्दिक अर्थ है-कुएं का ढक्कन या जाली।
प्रायः अधिकांश घरों में कुएं होते थे,जिनसे पीने,नहाने व सब्जी उगाने के लिये पानी की पर्याप्त व्यवस्था हो जाती थी ।इन कुओं में धूल व कचरे व पेंड़ के पत्ते आंदर न जाए, छोटे-छोटे बच्चे,जीव-जंतुओं को क्षति न हो इसलिए लकड़ी के तख्तों का मजबूत ढक्कन या महीन जाली लगा दिया जाता था ,जिसे *विनाह* कहा जाता था ।
अब तो कुआं भी विलुप्ति के कगार पर हैं ।विनाह के केवल अवशेष शेष रह गये हैं ।
आईए प्राचीन जल स्त्रोत कुएं का संरक्षण करें।विनाह भी लगाये ताकि कोई दुर्घटना न हो ।कुएं का पानी प्रदूषित न हो व कुएं के जल की स्वच्छता बनी रहे ।
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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