जिला :- महासमुंद
विषय :- पूर्वाग्रह
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- मत पालो कभी पूर्वाग्रह
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है जग से करबद्ध आग्रह,
मत पालो कभी पूर्वाग्रह।
है बेड़ी यह जो बढ़ते पग को,
जबरन ही बैठा देती है।
है यह वहीं की जो अक्सर,
मनोबल को डूबा देती है।
जो सोचते, सुनते जग में हम,
सच वह अक्सर होता नहीं।
सुन पूर्वानुमान तेरी वो जोगी,
थक हार कोई थम जाए नहीं।
परिवर्तन ही प्रकृति है,
तुम कैसे उसको झूठलाओगे।
हो सकता है जो सोचा न तुमने,
शायद वहीं बन जाओगे।
अनुमानों का त्याग करो तुम,
निज कर पर विश्वास रखो।
मत पालो मन में पूर्वाग्रह,
नित नूतन तुम प्रयास रखो।
है जग से करबद्ध आग्रह,
मत पालो कभी पूर्वाग्रह।
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