रचनाकार-एच-एस-अरमो ,अरमान ।
निवास-बायरन बाजार,रायपुर ।
जिला-रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
विधा-छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक-"" खिलौना """ ।
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¤¤¤¤•••|| खिलौना ||•••¤¤¤¤
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अब स्कूलों में भी--
होती है पढ़ाई व शिक्षा-दीक्षा,
खेल-खिलौने के माध्यम से ,
होता सबक जल्द याद और
मिले मनोरंजन व सीख -।
बिटिया रानी,बचपन से ही--
तीज-त्यौहारों के बहाने से,
माटी के खिलौने व गुड़िया से
खेलती व जीवन का पाठ है पढ़ती ।
बचपन में,दिल खुश करने--
मन को भरमाने के लिए,
साधन बना था,खिलौना,
बेकार हों या कीमती चीजों को,
खिलौना ही मान,खेलते --।
खेल और खिलौने ने ही--
खेल-खेल में--
मित्रता करना,हमको सिखाया ,
पल में लड़ते,पलभर में मिल जाते ।
अमीरों की विलासिता में--
गरीब-लाचार आदमी,
होता है,हुक्म का गुलाम,
उसे ,आदमी न समझकर,
मात्र एक खिलौना ही मानता --।
किसी की जिंदगी---
खुशी व गमों के साथ-साथ ,
मशीनी खिलौने होते ,
तब भी वे,सँसार में,जीविका चलाते।
खिलौना कभी,टूट भी जाय--
सुधर व जुड़ भी जाता है ,
मतलब परस्त लोग,
दग़ा देते हैं,खिलौने की तरह--।
सियासतदान अपने कारिंदों को--
खिलौना हैं,समझते,और
कठपुतली की तरह नचाते--।
रियासतों में,होती सियासत--
वज़ीर व सिपाहियों के बीच,
ओहदे के ,गुमान के लिए,
पर,राजा वफ़ादार खिलाड़ी ढूंढते।
खिलौने मानव जीवन के--
एक अभिन्न अंग हैं,होते ,
जन्म से मृत्यु तक ,काठ ही--
उसका साथ हैं,निभाते--।
आओ जाने जगत में--
हम तुम,एक खिलौना हैं,
अपने कर्मों के साथ जीते,
व समाज में,अलग पहचान बनाते ।
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