स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- कविता
शीर्षक -"नवीनीकरण"
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रुकता नहीं कभी समय
नवीनीकरण ले ही आती प्रलय
क्यूँ प्रकृति से पंगा लेते हो
जंग खुद क्यों नहीं साफ कर लेते हो।
नवीनता ऐसे नहीं आती
नवीनीकरण करलो भाई
नवीनीकरण में जब है अच्छाई
स्वीकार क्यों नहीं कर लेते हो।
डंस कितना सहें बताना
आगे बढ़ो बदलो जमाना
मांज लो गर हो गया पुराना
नवीनता ले ही आएगी फसाना ।
रुको मत कदम बढ़ाओ
खुद को बदलने तैयार हो जाओ
देखना तुमसे ही शुरुआत होगी
स्वयं कहोगे कि ठीक कहते हो।
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