Thursday, February 18, 2021

मोनालिसा बेहरा की रचना- नवीनीकरण

रचनाकार-मोनालिसा बेहरा
सुंदरगढ़, ओडिशा
विधा-काव्य
विषय-नवीनीकरण

जब होता है अपने 
पुराने घर का नवीनीकरण
जिसमे गुजरा था बचपन
जुड़ा था हर संस्मरण
लगता है ज्यों चिढा कर
भाग रहा हो,गुमशुम सा
कहीं छिप कर अपनी
नाराजगी जता रहा हो,
वो आंगन की आम की छांव
की शीतलता, वो गली-चबूतरे
पे बिखरे खेल-खिलौने
वो सखियों संग आंख-मिचौली
के छुपने के ठौर-ठिकाने
जैसे सब कुछ छूट रहा हो
पुराने घर के नवीनीकरण में
जैसे सब कुछ टूट रहा हो
अब मिट्टी के दीवारों की जगह
आलीशान मकान खड़ा है
आंगन की जगह छतों ने ले ली
इस नवीनीकरण ने सब कुछ 
बदल दिया है, सुख-सुविधाओं
के सारे साधन एक छत के नीचे दिया है
अब रात में बाहर ना जाना पड़ता
ना आंगन की खाट से तारे दिखता
पर सपने तो आज भी उसी पुराने
घर के आते हैं,खिड़की के बाहर
चिड़ियों का चहकना सुनते हैं
एक ही कमरे में जहां पूरा 
परिवार सो जाते थे
अब तो सबके अलग कमरें हैं
जिनमे ठहाकों के गूंज ना सुनाई देते हैं
यादों के झिलमिल सितारें आज भी
उसी पुराने घर झिलमिलाते हैं।।

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