संबलपुर, जिला-कांकेर, (छ.ग.)
विषय-छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत
दिनाँक-26.01.21
*छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत*
छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से बहुत अधिक समृद्धिशाली है ।हर दृष्टि से सांस्कृतिक धरोहरों को समेटे हुए छत्तीसगढ़ पौराणिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।भगवान राम का ननिहाल ,माता कौशल्या का मायका होने के कारण गौरव से गौरवान्वित यह प्रदेश प्राचीन सभ्यता ,संस्कृति, ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से अधिक धनी है ।प्राचीन मंदिरों के रूप में इस प्रदेश की विरासत उल्लेखनीय है।
धर्म, कला एवं इतिहास की दृष्टि से सिहावा का श्रृंगी ऋषि , राजिम का राजीव लोचन मंदिर ,कुलेश्वर मंदिर, महानदी,सोंढूर, पैरी के संगम को पाँचवा कुंभ की मान्यता दी गई है। बस्तर की दंतेश्वरी मंदिर, बारसूर का गणेश मंदिर, बत्तीसा मंदिर, तेलीन सत्ती, सिरपुर का बौध्द आश्रम, भोरमदेव का मंदिर, सीता बेंगरा, कुटुमसर की गुफा, अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुका है।
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में जतमई ,घटारानी, एवं भूतेश्वर नाथ मन्दिर,चंपारण का मंदिर, पलारी का सिद्धेश्वर मंदिर, चंदखुरी का शिवमंदिर, रतनपुर की महामाया, रायगढ़ के चंद्रहासिनी मन्दिर, रायपुर की महामाया मंदिर, संस्कृति एवं पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं ।संस्कृति, कला, साहित्य के संवर्धन संरक्षण के लिए निरंतर प्रयास हो रहे हैं। भाषा की विकास की दृष्टि से राजभाषा आयोग का गठन किया गया है ।छत्तीसगढ़ी को राजभाषा घोषित किया गया है।यहाँ की अद्वितीय एवं जीवंत संस्कृति किसी परिचय की मोहताज नहीं है। संगीत, नृत्य की दृष्टि से पंडवानी,सुआ नृत्य,करमा, जगार,रेला, माड़िया आदि सभी हमारी सांस्कृतिक विरासत की जानी पहचानी विधा के रूप में जानी जाती हैं।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर, (छ .ग.)
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