सुंदरगढ़, ओडिशा
विधा-मुक्त काव्य
विषय-पगडण्डी
खेतो -खलिहानों से गुजरती
पगडंडियों पे चलते हुए लोग
अक्सर गिर कर संभलने की,
हार ना मानने की कला जानते हैं
पगडंडियों पे अपने बच्चे को सुला
खेतों पर बेफिक्र काम करती हैं स्त्रियां
सिर पे पल्लू लिए ,कड़क धूप में बैठी
भोजन पे पति का इंतजार करती हैं
पगडंडियां अपने अधिकार क्षेत्र
की सीमा रेखा तय करती हैं
किसान बैठ कर इनमें निहारते रहते
हैं अपने लहलहाते फसल को
पहाड़ो पे रहते लोगों का जीवन
इन्हीं पगडंडियों पे संघर्ष करते
चढ़ते ,गुजरते जद्दोजहद में ही
ताश के घरों में गुजर जाती है
पगडंडियां संकरी भले हों
हमे सड़कों से जोड़ती हैं
हौसलों को पर देती हैं
संघर्षों से लड़ना सिखाती हैं।
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