Saturday, January 16, 2021

नलिनी बाजपेयी की रचना- रूह

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
     संबलपुर,जिला-कांकेर,(छ.ग.)
         विषय-रूह,
            दिनाँक-16.01.21
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                *रूह*

रस्मों-रिवाज से जोड़ा गया 
संबंध कभी टूट जाता है,
रूह से रूह का रिश्ता 
अमरत्व पा जाता है।

अंबर और धरा का नेह 
देता है एक मौन निमंत्रण,
अंबर के आदित्य से तप्त 
धरा की रूह मेघों को देती आमंत्रण।

धड़कनें प्रतिपल 
तुम्हारा किस्सा सुनाती है,
वही आत्मा के संबंध को 
हिस्सा बन दुहराती है।

उल्फत में शब्द 
बौने हो जाते है कभी,
तब रूह ही रूह को 
अपना असर दिखाता है।

आत्मा शाश्वत,अजर 
अमर अविनाशी होती है,
आत्मा के अस्तित्व को 
कोई शक्ति मिटा पाती नहीं है।

*व्याख्या* :- प्रस्तुत कविता में रूह की 
अमरत्व को बताती है।यह अजर ,अमर,
अविनाशी होती है।

     नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर,(छ.ग.)

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