भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक और आज़ाद हिन्द फौज के संस्थापक नेताजी सुभाषचंद्र बोस की जयंती पर आज उनकी संघर्ष यात्रा के बारे में इस महत्वपूर्ण पुस्तक का उल्लेख भी जरूरी है। देश की आज़ादी के लिए अपने मिशन में कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। 'मैं सुभाष बोल रहा हूँ ' शीर्षक से छपी यह पुस्तक उन ऐतिहासिक प्रसंगों का बोलता हुआ दस्तावेज है। यह छत्तीसगढ़ की वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका श्रीमती मणिकुन्तला बोस की लेखनी से एक बांग्ला पुस्तक आमी सुभाष बोलछि का हिन्दी रूपांतरण है।
मूल लेखक शैलेश दे हैं। यह पुस्तक द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान आज़ादी के आंदोलन की उन प्रमुख घटनाओं पर आधारित है। जिनका नेताजी के क्रांतिकारी जीवन से सीधा जुड़ाव रहा है। इनमें से कई घटनाओं का वर्णन किसी उपन्यास की शैली में किया गया है।
नेताजी सुभाष 17 जनवरी 1941 को एल्गिन रोड कोलकाता के अपने घर से वेश बदलकर मौलाना जियाउद्दीन का नाम धारण कर अंग्रेजी हुकूमत को धता बताते हुए किस तरह रहस्यमय ढंग से गायब हुए और कार द्वारा हावड़ा -बेलूड़ -बाली-उत्तरपाड़ा -चंदन नगर -चूंचड़ा -बांडेल -शक्तिगढ़ - वर्धमान - आसनसोल और बराक ब्रिज होते हुए गोमो पहुँचे और वहाँ से दिल्ली -कालका मेल पकड़कर पेशावर ,फिर वहाँ से कठिन पहाड़ी रास्तों पर कभी पैदल तो कभी खच्चरों पर यात्रा करते हुए अफगानिस्तान की राजधानी काबुल ,जहाँ काफी जद्दोजहद के बाद इटालियन दूतावास से सिनर ऑरलैंडो मैजोट्रा के नाम से उनका पासपोर्ट बना । वह काबुल से 28 मार्च 1941 को जर्मनी की राजधानी बर्लिन पहुँच गए। यहीं उन्होंने रेडियो पर भारत के लोगों के नाम 7 दिसम्बर को मैं सुभाष बोल रहा हूँ कहकर अपना पहला संदेश प्रसारित किया । कोलकाता से उनके भूमिगत होकर गायब होने के महीनों बाद रेडियो पर अचानक उनका संदेश सुनकर भारत के लोगों में आश्चर्य के साथ खुशी की लहर दौड़ गयी ।
पुस्तक में बताया गया है कि कोलकाता से काबुल और बर्लिन आदि की इन भूमिगत यात्राओं में सुभाषचंद्र बोस को अनेक देशभक्त भारतीयों का भरपूर सहयोग मिला। पुस्तक में तमाम घटनाओं और उनसे जुड़े व्यक्तियों का वास्तविक चित्रण है ,वहीं स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में देश में महात्मा गाँधी ,जवाहरलाल नेहरु और अन्य अनेक महान विभूतियों के नेतृत्व में हुए आंदोलनों और राजनीतिक घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है। पुस्तक में तत्कालीन अविभाजित भारत के बंगाल प्रांत की क्रांतिकारी घटनाओं और उनके पात्रों की चर्चा विस्तार से की गयी है। मेरे विचार से इन घटनाओं को सूचीबद्ध करके अलग -अलग अध्यायों में लिखा जाना चाहिए था। फिर भी लेखिका ने हिन्दी रूपांतरण में खूब मेहनत की है।
पुस्तक का हिन्दी रूपांतर 292 पृष्ठों का है। इसका प्रथम संस्करण वर्ष 2013 में प्रकाशित किया गया था। प्रकाशक थे दैनिक दंडकारण्य समाचार ,जगदलपुर (बस्तर ) के प्रधान सम्पादक तुषारकान्ति बोस ,जिनका 8 अक्टूबर 2020 को निधन हो गया। अब उनकी धर्मपत्नी श्रीमती मणिकुन्तला बोस इस दैनिक के प्रधान सम्पादक का दायित्व संभाल रही हैं।
आलेख : स्वराज करुण
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